मुरिया जनजाति के स्थानीय उपचारकों की परंपरागत चिकित्सीय पद्धति में आधुनिकता का प्रभाव एवं परिवर्तन का विश्लेषण
Keywords:
छत्तीसगढ़, बस्तर, मुरिया जनजाति, चिकित्सीय पद्धति, परंपरागत ज्ञान, आधुनिकीकरण, औषधियाँ, जीव-जन्तु, जादुई-धार्मिकAbstract
यह जनजाति प्रारंभ से ही वनों पर आश्रित है | मुरिया जनजाति किसी भी बीमारी के इलाज के लिए जादुई-धार्मिक अनुष्ठान, जड़ी- बुटियों पर विश्वास करते हैं । स्वास्थ्य और रोगों के मध्य अनेक मान्यताएं, रीति-रिवाज, मूल्य एवं प्रथाएं रही हैं जिनमें सदैव एक संबंध रहा है | सिरहा, वड्डे, पुजारी एवं दाई इन पारंपरिक चिकित्सकों द्वारा लोगों के स्वास्थ्य की देखभाल करते हैं | ये सामुदायिक चिकित्सक होते हैं जिन्हें सामाजिक संगठन द्वारा धार्मिक रूप से मान्यता प्राप्त होती है| प्रस्तुत शोध अध्ययन का उद्धेश्य स्वास्थ्य देखभाल करने हेतु मुरिया जनजाति के स्थानीय परंपरागत चिकित्सीय पद्धति का अध्ययन करना तथा उनमें आधुनिकता के प्रभाव से हुये परिवर्तनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है| यह शोध छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर संभाग की सुकमा जिले में निवासरत मुरिया जनजाति के सिरहा, वड्डे, पुजारी एवं दाई इन कुंजी सूचनादाताओं का चयन उद्धेश्यमूलक विधि से कर तथ्यों की जानकारी ली गई है | यह अध्ययन प्राथमिक तथ्यों पर आधारित है| पारंपरिक चिकित्सकों द्वारा लोगों के बीमारी उपचार हेतु प्राकृतिक औषधि, जीव-जन्तु एवं जादुई-धार्मिक पद्धति से नि:शुल्क सेवाएँ प्रदान किया जाता है | स्थानीय लोग इस प्रकार के रोग जैसे- पेट फूलना, कष्टदायक प्रसव, बिच्छू दंश, हड्डी टूटना, बवासीर, कमजोरी, मलेरिया, चेचक, पागलपन एवं पीलिया इन बिमारियों के उपचार के लिए प्राथमिक रूप से पारंपरिक चिकित्सकों के पास जाते हैं । स्थानीय उपचारक अपनी परंपरागत ज्ञान को विरासत में नई पीढ़ी को देते हैं | विभिन्न बिमारियों का उपचार इनके द्वारा कई पीढ़ियों से लगातार किया जा रहा है |

