धार्मिक परिवर्तन की समस्या: तारो सिन्दिक की कविताओं के विशेष संदर्भ में

Authors

  • चेबी मिहु Author

Keywords:

धार्मिक परिवर्तन की समस्या , तारो सिन्दिक

Abstract

            अरुणाचल प्रदेश के आदिवासी मुख्य रूप से प्रकृति पूजक हैं। यहाँ के जनजातीय समाज में कभी किसी ने मूर्ति पूजा, चित्र पूजा नहीं की। आदिवासी समाज के दर्शन के विषय में लिखते हुए वंदना टेटे जी अपनी ‘वाचिकता’ नामक पुस्तक में लिखती हैं कि “ वह प्रकृति की सर्वोच्चता को स्वीकार करता है और अदृश्य प्राकृतिक शक्तियों को इनसान की ही तरह सृष्टि के रचाव और बचाव का संरक्षक मानते हुए उनमें विश्वास करता है। अपने आनुष्ठानिक आयोजनों के द्वारा उनके प्रति आभार प्रकट करता है। पूजा नहीं , कृतज्ञता ज्ञापित करता है क्योंकि उसका विश्वास जड़ नहीं, निरंतर चेतनशील है। चेतनशील मतलब प्रकृति और इंसानी समाज के परम्परागत और परिवर्तनशील व्यवहार में सामंजस्य बिठाते हुए उसे आत्मसात करना और सार्वभौमिक अनुशासनों (संगति) के प्रति लगातार उत्तरदायी (तारतम्य) बने रहना है। प्रकृति से सामूहिक, सहजीवी और सहअस्तित्वपूर्ण संगति के कारण आदिवासी प्रकृतिगत यथार्थ और उसके अनुशासनों का कड़ाई से पालन करते है, जिसे गैर – आदिवासी विश्व अंधविश्वासों की श्रेणी में रखता है जबकि पूजा धार्मिक अंधविश्वास का चरम लक्षण है, जिससे दुनिया की सभी विकसित सभ्यताएं पीड़ित तो हैं ही ,एक – दूसरे के खून की प्यासी भी है।”1 अरुणाचल का आदिवासी फ़सल तथा  स्वास्थ्य आदि के लिए सूर्य और चांद तथा अदृश्य शक्तियों के प्रति अनुष्ठानों के द्वारा कृतज्ञता ज्ञापित करता है। तानी वंश यानी आदी, आपातानी, गालो, तागिन, न्यीशी, पुरोईक जैसे जनजातीय समाजों में ‘दोन्यी’ (सूर्य) और ‘पोलो’ (चाँद) को इष्टदेव माना जाता है। सूर्य यहाँ स्त्री का प्रतीक है। इनके ईश्वर निराकार हैं। 

Author Biography

  • चेबी मिहु

    शोधार्थी, राजीव गाँधी विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश

    Address - Lower Dibang Valley District Roing, Arunachal Pradesh, Pincode – 792110

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Published

2026-01-19

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