अभिजित मुहूर्त: दोषमुक्त कालखंड की संकल्पना और उसका वैज्ञानिक आधार
Keywords:
अभिजित मुहूर्त; वैदिक ज्योतिष; पंचांग; दिनमान; सौर मध्याह्न; कालजैविकी; Abhijit Muhurta; chronobiologyAbstract
वैदिक पंचांग-परंपरा में अहोरात्र के तीस मुहूर्तों में से दिन का आठवाँ मुहूर्त "अभिजित" कहलाता है, जिसे व्यवहार में सर्वदोषनाशक और अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रस्तुत शोध-पत्र इस मान्यता की शास्त्रीय, खगोलीय और कालजैविक (chronobiological) दृष्टि से समीक्षात्मक परीक्षा करता है। अध्ययन PRISMA 2020 तथा PRISMA-ScR के सिद्धांतों से निर्देशित एक संरचित संकल्पनात्मक समीक्षा है, जिसमें शास्त्रीय ग्रंथ-परंपरा, खगोल-इतिहास, मानव-कालजैविकी और ज्योतिष की वैज्ञानिक आलोचना से जुड़े 39 स्रोतों का विश्लेषण किया गया है। मुख्य निष्कर्ष चार हैं। प्रथम, अभिजित दिनमान के पंद्रह बराबर खंडों में आठवाँ है और इसलिए गणितीय रूप से सूर्योदय-सूर्यास्त के मध्यबिंदु अर्थात स्थानीय सौर मध्याह्न पर केंद्रित है। द्वितीय, इसकी अवधि स्थिर 48 मिनट नहीं, बल्कि दिनमान का पंद्रहवाँ भाग है; आगरा (27.18° उ.) के लिए यह ऋतु-अनुसार लगभग 41.1 से 54.9 मिनट के बीच बदलती है। तृतीय, घड़ी-आधारित स्थिर समय (जैसे 11:36 से 12:24) की प्रचलित विधि रेखांश और समय-समीकरण के कारण आगरा में कई दर्जन मिनट तक भटक सकती है। चतुर्थ, कालजैविक साहित्य मध्याह्न को प्रकाश, ताप और शरीर-क्रियात्मक लय का एक वस्तुनिष्ठ संदर्भ-बिंदु सिद्ध करता है, किंतु "दोषमुक्तता" का कोई प्रत्यक्ष प्रायोगिक प्रमाण उपलब्ध साहित्य में नहीं मिलता। अतः अभिजित की वैज्ञानिक आधार-भूमि खगोलीय परिशुद्धता में है, फलदायी दावे में नहीं। पत्र पाँच मौलिक स्थापनाएँ और भावी परीक्षण-योग्य परिकल्पनाएँ भी प्रस्तुत करता है।

