भारतीय काल-गणना में मुहूर्त विज्ञान: स्वरूप, महत्व एवं प्रासंगिकता 

Authors

  • Parhlad Singh Ahluwalia Author

Keywords:

मुहूर्त विज्ञान, पंचांग, काल-गणना, ज्योतिषशास्त्र, कालानुक्रमिकी, वैदिक खगोलविज्ञान, PRISMA-ScR, ब्रह्म मुहूर्त

Abstract

भारतीय काल-गणना परम्परा अत्यंत सूक्ष्म, गणितीय और दार्शनिक आधार पर विकसित हुई एक ऐसी प्रणाली है जिसमें दिन-रात्रि के चौबीस घंटों को तीस मुहूर्तों में विभाजित किया गया है — प्रत्येक मुहूर्त ठीक अड़तालीस मिनट (दो घड़ी) का है। प्रस्तुत शोध-पत्र एक व्यवस्थित साहित्य-समीक्षा (systematic literature review) पद्धति, विशेषतः PRISMA-ScR रूपरेखा का अनुकरण करते हुए, मुहूर्त विज्ञान के स्वरूप, ऐतिहासिक विकास, दार्शनिक आधार, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व तथा समकालीन वैज्ञानिक वैधता का विश्लेषणात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। अध्ययन में वैदिक ग्रंथों (शतपथ ब्राह्मण), ज्योतिषशास्त्रीय ग्रंथों (बृहत्संहिता, मुहूर्तचिन्तामणि, नारद संहिता) तथा आधुनिक कालानुक्रमिकी (chronobiology) एवं पुरातत्त्व-खगोलविज्ञान (archaeoastronomy) के प्रामाणिक शोध-स्रोतों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। परिणाम दर्शाते हैं कि मुहूर्त-विभाजन एक सुसंगत गणितीय मॉडल पर आधारित था जो सूर्योदय-सूर्यास्त केंद्रित सौर दिन को समान भागों में बाँटता था, किंतु "शुभ-अशुभ" के फलादेशात्मक (predictive) आयाम को आधुनिक प्रयोगसिद्ध विज्ञान का समर्थन प्राप्त नहीं है। साथ ही, ब्रह्म मुहूर्त में जागरण और सर्केडियन/अल्ट्राडियन जैविक लय के मध्य आंशिक सहसंबंध पर समकालीन शोध में रुचि बढ़ी है। शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि मुहूर्त विज्ञान को एक सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक एवं कालानुशासनात्मक व्यवस्था के रूप में वस्तुनिष्ठ ढंग से समझा जाना चाहिए, न कि अलौकिक निश्चयवाद के रूप में।

 

Author Biography

  • Parhlad Singh Ahluwalia

    Jamia Hamdard, New Delhi

     

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Published

2025-03-24

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How to Cite

भारतीय काल-गणना में मुहूर्त विज्ञान: स्वरूप, महत्व एवं प्रासंगिकता . (2025). शोध प्रकाशन SHODH PRAKASHAN, 2(9), 17-27. https://shodhprakashan.in/index.php/journal/article/view/180

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