वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा की लोकप्रियता: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • डॉ. राजपाल Author

Abstract

हिन्दी भाषा एक बड़े समाज की भाषा है। भारत की भाषायी स्थिति और हिन्दी के स्थान को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी आज भारतीय समाज के बीच राष्ट्रीय संपर्क की भाषा है। यह गर्व की बात है कि भारत ही ऐसा एकमात्र देश है जिसकी 5 भाषाएं विश्व की 16 प्रमुख भाषाओं की सूची में शामिल है औेर उसमें एक है हिन्दी भाषा। हिन्दी भाषा की अविरल धारा शताब्दियों से प्रवाहित होते हुए अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त करती है। इसकी उत्पति एवं विकास की लम्बी प्रक्रिया है। वस्तुतः हिन्दी भाषा को ईरानियों की देन माना गया है ‘हिन्दी‘ फारसी भाषा का शब्द है व हिन्दी शब्द की उत्पति सिंध से हुई है क्योंकि ईरानी भाषा में से ‘स’ को ‘ह’ बोला जाता है। वास्तव में हिन्दी शब्द सिंधु का प्रतिरुप है।
डॉ. हरिचरण वर्मा के अनुसार ‘हिन्दी’ मूलतः सिंधु शब्द का बदलारुप ‘ सिन्धु से ‘हिन्दू’ ‘हिन्द’ के साथ ‘ई’ प्रत्यय जोड़कर हिन्दी बना। हिन्दी अब केवल उतर भारत की भाषा ही नही , बल्कि समस्त भारत की राष्ट्रभाषा राजभाषा एवं सम्पर्क भाषा के रुप में विद्यमान है। आज यह देश की मानक भाषा के रुप में विराजमान है। यह हमारी संस्कृति , अस्मिता चेतना और हमारे स्वाभिमान की भाषा है। सरस्वती पाण्डेय जी कहते है कि हिन्दी भाषा को भारतीय संविधान सभा के द्वारा 14 सितम्बर 1949 ई 0 को हिन्दी भाषा को राजभाषा की मान्यता प्रदान की गई व इसी दिन को अब हिन्दी दिवस के रुप में मनाया जाता है। भारतीय संविधान के भाग 17, आठवी अनुसूची व अनुच्छेद 343-351 तक राजभाषा का संविधान में प्रावधान है। दक्षिण से उतर भारतीय धर्म व संस्कृति को समझने का माध्यम हिन्दुस्तानी भाषा ही रहा करती थी। गंगा, काशी, हरिद्वार व वृन्दावन आदि तीर्थस्थलों की यात्रा करने के इच्छुक दक्षिण भारतीय भी हिन्दी का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उत्साहित रहते थे उन्होंने सूर, उलसी, मीरा, कबीर, आदि सन्तों के भजन व प्रवचनों को सुनने के लिए अवष्य ही हिन्दी सीखी होगी। 

 

Author Biography

  • डॉ. राजपाल

    सहायक प्राध्यापक, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, हिसार, हरियाणा

     

     

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2023-12-26

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वैश्विक स्तर पर हिंदी भाषा की लोकप्रियता: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. (2023). शोध प्रकाशन SHODH PRAKASHAN, 1(6), 11-15. https://shodhprakashan.in/index.php/journal/article/view/123