पर्यावरण संतुलन और ऋतु परिवर्तन के अध्ययन में पारंपरिक काल-मान पद्धतियों की प्रासंगिकता

Authors

  • Parhlad Singh Ahluwalia Author

Keywords:

पारंपरिक काल-मान, ऋतु परिवर्तन, पंचांग, वेदाङ्ग ज्योतिष, ऋतुचर्या, भारतीय मानसून, पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान, PRISMA-ScR

Abstract

पृष्ठभूमि: भारतीय कृषि, जल-प्रबंधन और सांस्कृतिक जीवन ऋतु-चक्र पर आधारित हैं। आधुनिक जलवायु-विज्ञान ऋतु-परिवर्तन को उपग्रह, रेडियोमीटर और गणितीय मॉडलों से मापता है। इससे बहुत पहले वैदिक, वेदाङ्ग-ज्योतिष, सिद्धान्त-ज्योतिष और आयुर्वेद की परंपराओं ने वर्ष, अयन, ऋतु, मास और पक्ष के आधार पर एक सुव्यवस्थित काल-मान प्रणाली विकसित की थी।

उद्देश्य: यह अध्ययन जाँचता है कि पारंपरिक काल-मान पद्धतियाँ (क) खगोलीय-गणितीय शुद्धता, (ख) पारिस्थितिक-जैविक संगति, (ग) सामुदायिक संचरण और (घ) आधुनिक जलवायु-साक्ष्यों के साथ संवाद, इन चार कसौटियों पर कितनी प्रासंगिक हैं और उनकी सीमाएँ क्या हैं।

पद्धति: PRISMA-ScR (स्कोपिंग समीक्षा) के सिद्धांतों के अनुरूप संरचित साहित्य-मानचित्रण किया गया। केवल 2024 या उससे पूर्व के स्रोत शामिल किए गए। मूल संस्कृत ग्रंथों के उद्धरणों का विश्लेषण किया गया। भारतीय एवं वैश्विक जलवायु-अध्ययनों से तुलनात्मक आँकड़े लिए गए। काल-मान स्थिरांकों की तुलना ग्रंथों की युग-संख्याओं से पुनर्गणित मानों के आधार पर की गई।

परिणाम: सूर्यसिद्धान्त और आर्यभटीय के नाक्षत्र-वर्ष मान आधुनिक मान से लगभग 0.002 दिन भिन्न हैं। सिनोडिक मास में अंतर 0.00001 दिन से कम है। वेदाङ्ग-ज्योतिष का 366-दिवसीय वर्ष लगभग 0.76 दिन अधिक है, परंतु पाँच-वर्षीय युग के भीतर अधिकमास की संरचना ऋतु-सामंजस्य की स्पष्ट चेतना दर्शाती है। नाक्षत्र और सायन वर्ष के अंतर (लगभग 0.0142 दिन प्रतिवर्ष) के कारण निरयण पंचांगों में ऋतु-विचलन लगभग 70 वर्ष में एक दिन की दर से जमा होता है। इसका अर्थ है कि परंपरा मानक के रूप में नहीं, बल्कि बहु-साक्ष्य ढाँचे में सांस्कृतिक-पारिस्थितिक अभिलेख और परिकल्पना-स्रोत के रूप में प्रासंगिक है।

निष्कर्ष: पारंपरिक काल-मान पद्धतियाँ आधुनिक जलवायु-विज्ञान का विकल्प नहीं हैं, किंतु वे फिनोलॉजी-संकेतक, स्थानीय अनुकूलन-ज्ञान और सामुदायिक पर्यावरण-नैतिकता का मूल्यवान पूरक स्रोत हैं।

 

Author Biography

  • Parhlad Singh Ahluwalia

    Shodh Prakashan, Hisar, Haryana

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Published

2024-10-27

Issue

Section

Articles

How to Cite

पर्यावरण संतुलन और ऋतु परिवर्तन के अध्ययन में पारंपरिक काल-मान पद्धतियों की प्रासंगिकता. (2024). शोध प्रकाशन SHODH PRAKASHAN, 2(4), 69-83. https://shodhprakashan.in/index.php/journal/article/view/165

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