आपदा प्रबंधन और शुभ कार्यों के संपादन में दुष्ट मुहूर्तों (राहुकाल, यमगण्ड आदि) का निषेध: वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा वास्तविकता-उद्घाटनात्मक विश्लेषण
Keywords:
राहुकाल, यमगण्ड, गुलिककाल, मुहूर्तशास्त्र, आपदा प्रबंधन, दुर्मुहूर्त, कालक्रमिकी, जोखिम-बोध, PRISMA, धर्मशास्त्रAbstract
भारतीय ज्योतिषशास्त्र एवं मुहूर्तशास्त्र की परम्परा में राहुकाल, यमगण्ड, गुलिककाल तथा दुर्मुहूर्त जैसे "दुष्ट काल" (inauspicious time-segments) की अवधारणा सहस्राब्दियों से शुभ कार्यों के संपादन तथा संकटकालीन निर्णयों के नियमन में केंद्रीय भूमिका निभाती रही है। आधुनिक आपदा प्रबंधन (Disaster Management) एक समकालीन, साक्ष्य-आधारित अनुशासन है जो जोखिम न्यूनीकरण, पूर्व-चेतावनी, तथा समयबद्ध प्रतिक्रिया पर केंद्रित है। यह शोधपत्र इन दोनों ज्ञान-परम्पराओं—पारम्परिक काल-विभाजन सिद्धांत और आधुनिक आपदा-विज्ञान—के बीच संवाद स्थापित करते हुए "वास्तविकता-उद्घाटनात्मक" (Reality-Exposing) दृष्टिकोण अपनाता है। अध्ययन का उद्देश्य यह परखना है कि क्या राहुकाल एवं यमगण्ड जैसे काल-खंडों का निषेध केवल धार्मिक रूढ़ि है अथवा इसके पीछे कालक्रमिकी (Chronobiology), मानवीय सतर्कता-चक्र (Alertness Cycle), जोखिम-बोध मनोविज्ञान (Risk Perception Psychology) तथा सामाजिक अनुशासन के सुसंगत आधार विद्यमान हैं। व्यवस्थित समीक्षा हेतु PRISMA (Preferred Reporting Items for Systematic Reviews and Meta-Analyses) पद्धति का अनुपालन करते हुए प्राथमिक संस्कृत ग्रंथों (बृहत्संहिता, मुहूर्तचिन्तामणि, अग्निपुराण), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन दस्तावेज़ों (राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन नीति 2009, आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005, सेंडाई फ्रेमवर्क 2015), तथा कालक्रमिकी एवं जोखिम-मनोविज्ञान संबंधी वैज्ञानिक साहित्य का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्ष दर्शाते हैं कि यद्यपि राहुकाल-यमगण्ड की गणना ज्योतिषीय ग्रह-सिद्धांत पर आधारित है, तथापि इसका व्यावहारिक प्रभाव—अर्थात् कार्य-स्थगन, सामूहिक सतर्कता, तथा निर्णय-विलंब—मानव-सतर्कता-चक्र, सामाजिक जोखिम-बोध तथा अनिश्चितता-प्रबंधन के आधुनिक सिद्धांतों के साथ उल्लेखनीय समरूपता (concordance) प्रदर्शित करता है। यह पत्र यह तर्क प्रस्तुत करता है कि दुष्ट मुहूर्तों का निषेध एक प्राचीन, अनुभवजन्य रूप से परिष्कृत "सांस्कृतिक जोखिम-प्रबंधन प्रोटोकॉल" (Cultural Risk-Management Protocol) के रूप में कार्य करता रहा है, जिसे आधुनिक आपदा प्रबंधन ढांचे में सम्मानपूर्वक एवं वैज्ञानिक समझ के साथ समन्वित किया जा सकता है।

