अहोरात्र के त्रिंशत् मुहूर्त: ज्योतिषीय विभाजन और उनका प्रायोगिक महत्व
Keywords:
मुहूर्त, पंचांग, अहोरात्र, ज्योतिषशास्त्र, कालगणना, सर्केडियन रिदम, ब्रह्म मुहूर्त, वैदिक खगोलशास्त्रAbstract
भारतीय ज्योतिषशास्त्र में काल-गणना की एक अत्यंत सूक्ष्म एवं व्यवस्थित पद्धति प्राचीन काल से प्रचलित रही है, जिसके अंतर्गत एक अहोरात्र (24 घंटे) को 30 मुहूर्तों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक मुहूर्त की अवधि ठीक 48 मिनट (2 घड़ी) होती है, और प्रत्येक का एक पृथक देवता, स्वभाव (शुभ/अशुभ) तथा कर्म-अनुकूलता निर्धारित है। यह शोधपत्र इस त्रिंशत्-मुहूर्त व्यवस्था का ऐतिहासिक, सैद्धांतिक एवं तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है, तथा इसे आधुनिक कालानुक्रमिकी (Chronobiology) और सर्केडियन रिदम (Circadian Rhythm) विज्ञान के प्रकाश में परखने का प्रयास करता है। अध्ययन की पद्धति व्यवस्थित समीक्षा (systematic review) के सिद्धांतों, विशेषतः PRISMA ढाँचे, पर आधारित है। परिणाम दर्शाते हैं कि यद्यपि पारंपरिक मुहूर्त-व्यवस्था का आधार धार्मिक एवं दैवीय प्रतीकवाद है, तथापि इसके अनेक समय-विभाजन मानव शरीर की जैविक घड़ी (biological clock) के प्राकृतिक चक्रों से उल्लेखनीय साम्य रखते हैं। पत्र में दो तुलनात्मक सारणियाँ प्रस्तुत की गई हैं — प्रथम सभी 30 मुहूर्तों का विवरणात्मक वर्गीकरण, द्वितीय मुहूर्त-कालों एवं आधुनिक सर्केडियन चरणों के मध्य तुलना। निष्कर्षतः यह शोध मुहूर्त-विज्ञान को अंधविश्वास अथवा केवल धार्मिक कर्मकाण्ड के रूप में न देखकर, एक प्राचीन अवलोकन-आधारित कालगणना प्रणाली के रूप में प्रस्तुत करता है, जिसका प्रायोगिक महत्व आज भी विद्यमान है।

