कृषि एवं व्यापारिक गतिविधियों में मुहूर्त शास्त्र की प्रासंगिकता: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Keywords:
मुहूर्त शास्त्र, पंचांग, कृषि-पराशर, वृक्षायुर्वेद, बुवाई-काल, व्यावसायिक शुभारंभ, चंद्र-चक्र, व्यवहारिक वित्त, लोक-कृषि ज्ञानAbstract
भारतीय कर्म-परंपरा में किसी कार्य का आरंभ केवल भौतिक तैयारी का विषय नहीं माना गया। उसके लिए "काल" की उपयुक्तता भी विचारणीय रही। इसी विचार का संस्थागत रूप मुहूर्त शास्त्र है, जो ज्योतिष की संहिता तथा होरा-परंपरा से विकसित हुआ और कृषि, यात्रा, गृह-निर्माण, विवाह और वाणिज्य जैसे कर्मों के आरंभ-काल का निर्धारण करता है। प्रस्तुत अध्ययन इस प्रश्न का परीक्षण करता है कि इक्कीसवीं सदी की कृषि और व्यापारिक गतिविधियों में मुहूर्त-परंपरा की प्रासंगिकता किस स्तर पर, किस प्रकार और किन सीमाओं के साथ सिद्ध होती है। अध्ययन में शास्त्रीय स्रोतों (कृषि-पराशर, वृक्षायुर्वेद, बृहत्संहिता, अर्थशास्त्र तथा मुहूर्त-ग्रंथों) का विश्लेषणात्मक पाठ-पठन किया गया है। साथ ही कृषि-खगोल, कृषि-जलवायु विज्ञान, व्यवहारिक वित्त और सामाजिक मनोविज्ञान के प्रकाशित अनुभवजन्य शोधों से उसकी तुलना की गई है। निष्कर्ष त्रि-स्तरीय हैं। पहला, मुहूर्त का वह अंश जो ऋतु, वर्षा-आरंभ और नक्षत्र-आधारित कैलेंडर से जुड़ा है, कृषि-कालगणना के रूप में परीक्षण-योग्य और व्यावहारिक रूप से उपयोगी है। दूसरा, ग्रह-स्थिति और व्यक्तिगत कुंडली से जुड़े शुभाशुभ दावों के पक्ष में प्रकाशित नियंत्रित अध्ययन अब तक सुदृढ़ प्रमाण नहीं देते। तीसरा, मुहूर्त का सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कार्य (अनिश्चितता में आत्मविश्वास, सामूहिक समन्वय और सांस्कृतिक निरंतरता) स्वतंत्र रूप से सार्थक है। अध्ययन परंपरा के न तो अंध-समर्थन का और न ही उसके सर्वथा निषेध का पक्षधर है। वह साक्ष्य-आधारित, परीक्षण-योग्य और पुनरुत्पादन-योग्य शोध-कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करता है।

