वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक मुहूर्त निर्धारण की पद्धतियों में ऐतिहासिक परिवर्तन: एक विश्लेषणात्मक एवं तुलनात्मक शोध
Keywords:
मुहूर्त, पंचांग, वेदांग ज्योतिष, नक्षत्र, अयनांश, काल-निर्णय, ज्योतिष का इतिहासAbstract
मुहूर्त (शुभ-काल) का निर्धारण भारतीय सांस्कृतिक जीवन की उन परम्पराओं में है जिनकी निरन्तरता सबसे अधिक दिखाई देती है, पर उसकी आंतरिक संरचना बार-बार बदली है। यह शोध-पत्र ऋग्वेद-अथर्ववेद काल से लेकर 2024 तक की मुहूर्त-निर्धारण पद्धतियों का ऐतिहासिक, तुलनात्मक और आलोचनात्मक अध्ययन करता है। अध्ययन PRISMA-ScR की पारदर्शिता-भावना से प्रेरित स्कोपिंग-समीक्षा पद्धति पर आधारित है। इसमें प्राथमिक संस्कृत स्रोतों और 1860 से 2024 तक के द्वितीयक शोध का विश्लेषण किया गया है।
तीन मुख्य निष्कर्ष सामने आते हैं। पहला, मुहूर्त-निर्धारण का आधार क्रमशः ऋतु-यज्ञ-कालगणना (वैदिक), पंचवर्षीय युग-गणित (वेदांग), गृह्य-स्मृति के सामान्य विधान, फलित-प्रधान नियम (सिद्धान्त-होरा काल), निबन्ध-ग्रन्थों की जटिल निषेध-सूचियों (मध्यकाल) और अन्ततः राज्य-मानकीकृत तथा डिजिटल पंचांग (आधुनिक काल) में बदलता गया। दूसरा, खगोलीय गणना की शुद्धता लगातार बढ़ी, जबकि फल-निर्णय के नियम बहुगुणित होते गए और अनुभवजन्य सत्यापन के बिना ही। तीसरा, अयनांश-भेद से नक्षत्र और योग की गणना में कुछ पद्धतियों के बीच 10 से 21 प्रतिशत तक असहमति संभव है, जबकि तिथि गणितीय रूप से अयनांश-निरपेक्ष रहती है। यह लेखक की अपनी गणना है (सारणी 2)। पत्र एक त्रिस्तरीय ज्ञानमीमांसीय मॉडल प्रस्तावित करता है जिसमें खगोलीय-गणितीय, शास्त्रीय-नियम और सामाजिक-व्यावहारिक स्तर अलग-अलग परखे जाते हैं।

