नाथपंथी पांडुलिपियों में परिलक्षित परंपरागत चिकित्सा पद्धति: एक नृ -ऐतिहासिक अधययन(1000 AD – C.2000AD): उत्तराखंड के सन्दर्भ में
Keywords:
नाथ, सिद्ध, आपरक्षा, हठयोग, नाथन, नाथपंथी, गूँठ, सदावर्त, मैमन्दा वीर, गोरखनाथ, मत्स्येन्द्रनाथ, नादवुद, घटथापना, , नादबुद, रखवाली, नरसिंह वाली, , समैण, चौड़ियावीर, सैद्धाली, भैरपावलीAbstract
नाथ शब्द को व्याख्यायित करते हुए कहा है कि ‘ना’ शब्द का अर्थ है अनादि रूप से या 'थ 'का अर्थ है -स्थापित होना, इस प्रकार नाथ मत का स्पष्टार्थ वह अनादि धर्म है जो भुवनत्रय की स्थिति का कारण है श्री गोरक्ष को इसी कारण से 'नाथ' कहा जाता है(द्विवेदी, 19 50 :3) यह विश्वास किया जाता है कि आदिनाथ स्वयं शिव ही है और मूलतः नाथ सम्प्रदाय शैव हैं।‘हठयोग प्रदीपिका’’की टीका में ब्रह्मानंद ने लिखा है कि सब नाथों में प्रथम आदिनाथ हैं, जो स्वयं शिव ही हैं.’गोरक्षा सिद्धांत संग्रह’ में लिखा है कि इस मत को अवधूत मत भी कहते हैं, गोरखनाथ ने योग जगाकर भक्ति को दूर कर दिया था (द्विवेदी, 1950:1). जान पड़ता है कि नाथपंथ शैव सम्प्रदाय का ही साधना पंथ है(कुकरेती, 2003 :27). नाथपंथ चौरासी सिद्धों से ही निकला है(राहुल, 1953 :162). पँवार वंश राजाओं के मूल पुरुष भीनापाल को सत्यनाथ का आशीर्वाद मिला था।जोशीमठ के कैत्यूरी वंश के राजाओं को नरसिंह नाम के नाथ योगी ने वहां से कत्यूर घाटी में जाने के लिए विवश किया था, पँवारवंशीय राजा अजयपाल तो नाथ सम्प्रदाय में बाबा अजेयपाल के नाम से जाने जाते हैं(कुकरेती, 2003 :36) पंद्रहवी शताब्दी में नाथ सम्प्रदाय इस क्षेत्र में पुष्पित पल्लवित हुआ।इतिहासकार शिव प्रसाद डबराल ने पँवारवंशी नरेश श्यामशाह का उल्लेख करते हुए कहा कि श्यामशाह प्रातः उठता था, स्नान करके वह विधि विधान से संध्या पूजा करता था, कौलाचारियों की पूजा विधि के अनुसार पूजा करके वह प्रतिदिन माता पिता को तर्पण करता था(डबराल, 40). महीपतिशाह वाममार्गी शाक्त साधक था, अजयपाल के राजयकाल में देवलगढ़ के सत्यनाथ सम्प्रदाय के नाथ योगियों को जो प्रतिष्ठा प्राप्त हुई थी वह अब तक बनी रही. महीपतिशाह के शासनकाल के सम्वत 1683 आषाढगते के एक शिलालेख से विदित होता है देवलगढ़ में हंसनाथ और प्रभातनाथ बड़े प्रभावशाली विद्वान हुए. कुमाऊं और गढ़वाल के इतिहास से जाना पड़ता है कि 1500 के आसपास गढ़वाल और चम्पावत में सत्यनाथ और नागनाथ नामक दो गोरखपन्थयोगियों ने अपनी खानकाह में डेरे जमाए थे.इनमें नागनाथ सत्यनाथ का शिष्य था, ये दोनों योगी हठयोग को समर्पित थे( कुकरेती, 2003 :68).

