भारतीय ज्योतिष में काल-विभाजन और मुहूर्त विज्ञान का दार्शनिक एवं वैज्ञानिक अध्ययन
Keywords:
काल-विभाजन; मुहूर्त; पंचांग; ज्योतिष; कालजैविकी; मिथ्याकरणीयता; PRISMA-ScR; भारतीय ज्ञान-परंपराAbstract
भारतीय ज्योतिष-परंपरा का केंद्रीय सरोकार "काल" है — ऐसा काल जिसे नापा जा सके, विभाजित किया जा सके और जिसके भीतर मानवीय कर्म का स्थान निर्धारित हो। यह शोध-पत्र काल-विभाजन (निमेष से कल्प तक) और मुहूर्त-विज्ञान को चार स्तरों — दार्शनिक, खगोलीय, कालजैविक (क्रोनोबायोलॉजिकल) तथा मनोसामाजिक — पर परखता है। PRISMA-ScR की रिपोर्टिंग-भावना पर आधारित लक्षित संरचित समीक्षा-पद्धति अपनाकर वर्ष 2024 तक प्रकाशित कुल 66 स्रोतों (शास्त्रीय पाठ, खगोल-इतिहास, प्रायोगिक परीक्षण, कालजैविकी, समाजशास्त्र) का विश्लेषण किया गया है। निष्कर्ष त्रिस्तरीय हैं। पहला, पंचांग की गणितीय-खगोलीय इकाइयाँ (तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण) आधुनिक ग्रह-गतिकी से सत्यापन-योग्य हैं और भारतीय खगोल-गणना की सटीकता का प्रमाण हैं। दूसरा, मुहूर्त का "शुभ-अशुभ" फल-दावा अब तक किसी नियंत्रित, द्वि-अंध (double-blind) परीक्षण में स्थापित नहीं हुआ है; इसके विपरीत, चंद्र-चक्र और जैव-लय पर उपलब्ध प्रमाण केवल सीमित, सूक्ष्म और परिस्थिति-निर्भर प्रभाव दर्शाते हैं। तीसरा, मुहूर्त की वास्तविक सामाजिक उपयोगिता समन्वय (coordination), अनुष्ठान-जनित चिंता-न्यूनता और समय-अनुशासन में दिखाई देती है। लेखक एक "त्रिस्तरीय सत्यापन-प्रतिमान" प्रस्तावित करता है, जो काल-गणना, काल-बोध और फलादेश को अलग-अलग ज्ञानमीमांसीय कसौटियों पर रखता है।

