ज्योतिष शास्त्र में 'अमृत' और 'ब्रह्म' मुहूर्त का आध्यात्मिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव
Keywords:
ब्राह्म मुहूर्त; अमृत मुहूर्त; ज्योतिष; कालजैविकी; मानसिक स्वास्थ्य; आध्यात्मिक स्वास्थ्य; PRISMA-ScRAbstract
पृष्ठभूमि: भारतीय ज्योतिष-परंपरा में दिन के कुछ खंडों को विशेष फलदायी माना गया है। 'ब्राह्म मुहूर्त' और 'अमृत मुहूर्त' (अमृत चौघड़िया/अमृत सिद्धि योग) आज सबसे अधिक चर्चित हैं। इनके आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्रायः श्रद्धा के आधार पर दोहराए जाते हैं। उनकी साक्ष्य-आधारित आलोचनात्मक परीक्षा बहुत कम हुई है।
उद्देश्य: (क) दोनों अवधारणाओं के शास्त्रीय आधार का पाठ-आधारित निरूपण करना। (ख) कालजैविकी, नींद-विज्ञान, ध्यान/प्राणायाम और अनुष्ठान-मनोविज्ञान के साक्ष्यों से इनकी तुलना करना। (ग) यह स्पष्ट करना कि लाभ का स्रोत 'ज्योतिषीय काल' है या उससे जुड़ा व्यवहार।
विधि: PRISMA-ScR और PRISMA 2020 की रिपोर्टिंग-भावना पर आधारित संकल्पनात्मक स्कोपिंग समीक्षा। इसमें 58 स्रोत सम्मिलित हैं: 8 शास्त्रीय संस्करण, 34 सहकर्मी-समीक्षित अध्ययन/समीक्षाएँ और शेष सहायक स्रोत। सभी स्रोत 2024 या उससे पूर्व के हैं।
परिणाम: ब्राह्म मुहूर्त का पाठ-आधारित उल्लेख मनुस्मृति और अष्टांगहृदय में मिलता है। 'अमृत मुहूर्त' मुख्यतः पंचांग/चौघड़िया परंपरा की संकल्पना है, जो कार्यारंभ-चयन से जुड़ी है, दैनिक जागरण से नहीं। आधुनिक साक्ष्य किसी "जादुई घड़ी-समय" का समर्थन नहीं करता। वह नींद की पर्याप्तता और नियमितता, प्रातःकालीन प्रकाश और ध्यान-प्राणायाम जैसे व्यवहारों का समर्थन करता है। जन्म-कुंडली आधारित भविष्यवाणी के प्रमाण कमज़ोर हैं। अनुष्ठान-जन्य अपेक्षा-प्रभाव से वास्तविक मनोवैज्ञानिक लाभ संभव है।
निष्कर्ष: मुहूर्त का लाभ ज्योतिषीय संयोग से नहीं, बल्कि 'पर्याप्त नींद × नियमितता × अभ्यास × अर्थ-बोध' के संयोग से उत्पन्न होता है। इसके लिए 'त्रि-स्तरीय सेतु प्रतिरूप' और परीक्षण-योग्य परिकल्पनाएँ प्रस्तावित हैं।

