मौर्यकालीन प्रशासनिक संरचना एवं सम्राट अशोक के धम्म का सामाजिक प्रभाव: एक ऐतिहासिक-विश्लेषणात्मक शोध
Keywords:
मौर्य साम्राज्य; प्रशासन; अशोक; धम्म; अभिलेख; अर्थशास्त्र; धम्म-महामात्र; सामाजिक इतिहासAbstract
यह शोध-पत्र मौर्य साम्राज्य (लगभग 321–185 ई.पू.) की प्रशासनिक संरचना और सम्राट अशोक (लगभग 268–232 ई.पू.) की धम्म-नीति के सामाजिक प्रभावों का एकीकृत अध्ययन है। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या अशोक का धम्म केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक परिवर्तन था, या विशाल, बहुभाषी और सामाजिक रूप से विविध साम्राज्य को नैतिक-वैचारिक सूत्र में बाँधने की प्रशासनिक रणनीति भी था। अध्ययन में अशोक के अभिलेखों, कौटिल्य के अर्थशास्त्र, मेगस्थनीज़ के यूनानी-रोमन उद्धरणों और बौद्ध परंपरा के ग्रंथों का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया है। साथ ही आधुनिक इतिहासलेखन के बौद्ध-परंपरागत, राष्ट्रवादी, मार्क्सवादी, संशोधनवादी और उत्तर-औपनिवेशिक स्मृति-अध्ययन वाले दृष्टिकोणों की समीक्षा की गई है। निष्कर्ष यह है कि मौर्य प्रशासन अपेक्षाकृत विकसित, श्रेणीबद्ध और सूचना-आधारित तंत्र था, पर उसकी पहुँच क्षेत्र-विशेष के अनुसार असमान थी। अशोक ने कलिंग-युद्ध के बाद इस तंत्र में धम्म-महामात्र, राजुक-अधिकार और अनुसंयान (निरीक्षण-यात्रा) जैसे उपकरणों के सहारे नैतिक-कल्याणकारी आयाम जोड़ा। धम्म का सामाजिक प्रभाव सहिष्णुता, पशु-संरक्षण, जन-कल्याण, मानवीय दंड-नीति और पारिवारिक-सामाजिक आचार के क्षेत्रों में सबसे स्पष्ट दिखता है। फिर भी अभिलेख राज्य द्वारा निर्मित स्रोत हैं, इसलिए धम्म की वास्तविक सामाजिक स्वीकृति का माप सावधानी की माँग करता है।

